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Friday, May 22, 2015

'मेरा प्यारा पहाड़'

पहाड़… कितने स्थिर दिखते हैं… लेकिन उनमें बहुत कुछ बदलता रहता है… साल दर साल… सदियों के दौरान। लेकिन फिर भी प्रकृति के ये स्तम्भ, हमें अपनी सबसे पुरानी यादों से जोडे रखते हैं। पंद्रह साल पहले जब अजमेर आकर बसे थे तो इस पहाड़ के सामने ये घर बनाया था। सामान्यत: पहाडों से बर्फ याद आती है लेकिन ये गर्म रेगिस्तान का पहाड़ है, हमेशा धीर गम्भीर बना रहता है बस सावन में मुस्कुराता है। और ये तेज हवा जो चल रही है आज… ये भी कैसी पुरानी राजदार मूडी सखी की तरह है। क्या ये आज भी उन्हीं अणुओं की बनी है जिनसे पाँच या दस साल पहले बनी थी? इन सालों में कितने आगे चली आई हूँ मैं। थोडे समय में ज्यादा दूरी तय की है। लेकिन ये पहाड़ ये हवा, मेरे साथ बदलते हुए भी बिल्कुल पहले जैसे मेरे साथ हैं और मैं इनके पास अपनी छत पर खडी हूँ। ये छत भी पहले इतनी ऊँची नहीं थी। घर कैसे धीरे धीरे बडा हुआ है, पहले एक कमरा और बगीचा, फिर कमरे बढते गये उनकी सजावट बदलती गयी, बगीचा भी फलों और फूलों से सजता गया। जिन्दगी के बहुत से पाठ मैंने इससे सीखे जिसे मम्मी ने इतने प्यार और मेहनत से संवारा, जिन्दा रखा। पहली मंजिल के पूरे होने के बाद फिर दूसरी मंजिल पर एक एक कर कमरे बने और सबसे आखिर में बनी मेरी सबसे पसंदीदा ये छत जिस पर मैं खडी हूँ। कितना सब कुछ हुआ है यहाँ आने के इन सिर्फ पंद्रह सालों में। छोटे रवि की तो कुल उमर है ये। समय इतना तेज चला है कि प्रतीक जिसकी जिन्दगी ठहरी सी लगती है वो भी बहुत धीरे ही सही लेकिन बदला है, संभला है। मेरे बचपन का साथी, मेरी खुशियों की वजह, मेरे दिल का दर्द, चाहे अब बीस साल का हो गया है लेकिन वहीं नन्हा मासूम सा बच्चा है जो रवि से जरा भी बड़ा नहीं दिखता। मम्मी पापा, वो भी तो कितना बदले हैं, सीखे हैं, संवरे हैं साथ साथ, ये साम्राज्य उन्हीं का तो है।

क्या मैं वैसी ही हूँ? मन में झाँकती हूँ तो मुश्किल से नौ साल की एक लडकी दिखायी देती है। चुप चुप खोयी हुई सी या दुनिया जहान की बहुत सी बातें करने वाली। अपने परिवार अपने भाई को लेकर उसके सपने, दुनिया को ‘ठीक’ कर देने के उसके निश्चय और एक दिन बहुत मशहूर हो जाने की उसके मन की आग। बहुत बार वो पहाडों में भी खो जाना चाहती थी, गुमनाम, अध्यात्म की राह पर, लेकिन लौट आती थी अपनी कल्पनाओं से क्योंकि जरुरत है इस दुनिया को उसकी। ईश्वर को खोजने वो फिर कभी निकल सकती है। फिर मम्मी पापा भी तो डाँट देते हैं जब टीवी पर ॐ नम: शिवाय देखते हुए वह भी तपस्या में लीन होने की कोशिश करती थी। फिर उसका मन भटकता भी तो कितना है। उसे एक दिन प्यार भी करना है, हालांकि बिल्कुल खूबसूरत और प्यारी नहीं लगती वो किसी को स्कूल में। बस हड्डियों का ढाँचा जो बहुत गोरी भी नहीं और जिसके चेहरे पे ये बडा सा तिल है। वो तो कभी टॉप भी नहीं करती लेकिन हमेशा आगे की पंक्ति में बैठना ही उसे पसंद है, लम्बाई भी तो कम है उसकी। उसे दूसरी छोटी बचचियों की तरह प्यारी प्यारी बेवकूफी भरी बातें करना और बात बात पर खिलखिलाना पसंद नही। उसे या तो बहुत सूक्ष्म या बहुत बडी बड़ी बातें करना पसंद है। शायद इसलिये उसे कोई प्यार नहीं करता। लेकिन एक दिन तो वो बहुत लोकप्रिय होने ही वाली है।
 सी लडकी ने जब ये पहाड़ पहली बार देखा तो नहीं जानती थी कि उसकी हर एक याद को वो अपने में इस तरह सहेज लेगा, उसे खुद से जोड़े रखेगा। अजमेर आते ही जिन्दगी बदल सी गयी, बदली क्या उसे तो मानो ये सब पहले ही पता था, फिर भी यकीन करने में वक्त लग गया। उस नौ साल की उमर में ही, अपने पापा के विश्वास के चलते, मम्मी के स्नेह और अपने चुनौतियों को बहुत मामूली समझने की आदत के चलते जब दसवीं का इम्तहान पास कर लिया तो मानो दुनिया ने उसे सिर पर चढा लिया। पता नहीं प्यार किया या नहींl लेकिन वह एक कौतूहल की चीज़ जरूर हो गयी। अच्छा है कि ये सब उसके सिर पर नहीं चढा लोग तो फिर भी कह देते हैं, लडकी अभिमानी है, उनकी इस मान्यता के आगे हार मान ली उसने। जो जानने लगते हैं कम से कम वो तो उसे चाहते हैं।




तब से आज तक कितनी दूर चल कर आ गयी हूँ मैं और कितनी तेजी से। मेरी रफ्तार मानो बढती से ही जा रही है। जब नहीं सम्भाल सकी, रुक कर सम्भल भी गयी हूँ। कितने सारे लोगों से मिल ली हूँ मैं ,कितनों के दिल में बस गयी और कितने ही मेरे दिल में रहने लगे। उपलब्धियाँ जुटाये जा रही हूँ और ठोकरों को मैं गिनना नहीं चाहती। बहुत बार क्रूर बनी हूँ, बहुत बार लोगों ने निराश किया है मुझे और मैंने अपना दिल तोडा है। इस तरह कितनी अलग अलग तरह के और उमर के लोग अलग अलग कारणों अलग अलग जगहों से मेरे दोस्त बने है। कई दूर भी चले गये हैं, बहुत याद भी आते है और कभी कभी कहीं मिल भी जाते हैं। दिल के तार अब इन्टरनेट की तरंगों से भी जुड गये हैं। इतने सब लोगों के साथ भी मेरे अकेलेपन को इस पहाड़ ने देखा है। प्यार को जागते हुए भी देखा है और जब जब मैं मायूस हुई हूँ मुझे ये सब कुछ याद भी दिलाया है। मुझे इस तेज हवाओं वाली सुबह ये अहसास हुआ है कि इस पहाड़, छत पर मेरी इस जगह से कितना प्यार करती हूँ मैं और मेरी जिन्दगी में और जितने भी लोग हैं, उन सभी से।



   

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-05-2015) को "माँगकर सम्मान पाने का चलन देखा यहाँ" {चर्चा - 1985} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है पहाड़ को खुद से जोड़ते हुऐ ।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति

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  4. नन्ही लेखिका को बड़े होते देखना सुखद है। बहुत मशहूर हो जाने की उसके मन की साध भी पूरी होगी। शुभकामनायें। :)

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  5. पहाड़ और उनसे जुड़ी लेखनी जैसे एक ही हों दोनों ...
    रोचक लिखा है .. संवेदनशील लिखा है ...

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  6. हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति

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  7. I don’t know how should I give you thanks! I am totally stunned by your article. You saved my time. Thanks a million for sharing this article.

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